…तो मुज़फ़्फ़रपुर कांड नहीं होता साहब!


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क्यों नहीं पूछा कि अस्पताल है मगर डॉक्टर और दवाई क्यों नहीं है? कब हमने आवाज़ उठाई कि पटना का नवजात एम्स मृतप्राय क्यों है?

New Delhi, Jun 19 : पत्रकारों और संपादकों की जमात संवेदनशील पत्रकारिता के लिए आजकल मुज़फ़्फ़रपुर में है। वहां बच्चों की मौत को सीढ़ी बनाकर सच्ची पत्रकारिता का कर्तव्य निभाने का प्रहसन हो रहा है। लेकिन यक़ीन मानिए कि आम दिनों में – सरकारी बदहाली की स्टोरी अगर मुज़फ़्फ़रपुर प्रवास पर गए संपादकों के सामने रखी जाती तो वो उसे रद्दी की टोकरी में फेंक देते।

रिपोर्टर से कहते कि मसाला लाओ, वर्ना घर जाओ। असाइनमेंट पर चिल्लाते कि ऐसी स्टोरी अप्रूव किसने की, क्या किसी से छिपा है कि

सरकारी अस्पतालों की हालत क्या है? कुल मिलाकर नकारे सिस्टम का खटारापन जारी रहता और मीडिया तब निद्रा से अल्पकालिक जागता, जब चमकी बुखार 136 बच्चों की जान ले लेता, जैसा मुज़फ़्फ़रपुर कांड में हुआ है।

इकलौता मीडिया दोषी नहीं है। ज़रा सोचिए कि हम अपनी सरकार कैसे चुनते हैं? हमारे जनप्रतिनिधियों को किस आधार पर टिकट मिलता है?

कोई अकर्मण्य बिना कुछ किये-धरे कैसे मंत्री पद को सुशोभित करने लगता है? कब हमने व्यवस्थापकों और माननीयों से सीधे पूछा कि हमारे जिले में प्राथमिक अस्पताल क्यों नहीं है?

क्यों नहीं पूछा कि अस्पताल है मगर डॉक्टर और दवाई क्यों नहीं है? कब हमने आवाज़ उठाई कि पटना का नवजात एम्स मृतप्राय क्यों है? वहाँ सभी तरह के डॉक्टर और डिपार्टमेंट क्यों नहीं हैं? हम ये सब नहीं पूछते। हम जात देखते हैं। धर्म देखते हैं। पैसा देखते हैं। हम विकास के नाम पर तो वोट ही नहीं देते। हम तो बेहतर इलाज के बुनियादी हक़ को भगवान भरोसे छोड़ने के आदी हैं। ऐसे में, हमें 136 बच्चों की मौत पर घड़ियाली आँसू बहाने का अधिकार नहीं है। अगर व्यवस्था निष्प्राण है तो उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी हम सब की है। 136 बच्चे का दुखद अंत – सिस्टम की अमावस मिटाने के लिए है…क्या हम ऐसा कर पाएँगे। इसे सोचकर देखिएगा…नए भारत के लिए ये एक चुनौती है!


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AKStaff

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